अँधियारा

अंधियारे में बैठकर उजाले को देखना,

और उसकी खुद से दूरी का कारण जानना,

कि वो रोशनी मुझपर क्यों नहीं है

या मैं क्यों मजबूर हूँ उसे गले न लगाने में |

वह उजाला सुनसान है,

पर मुझे पता है, बहुत चेहरे छुपे है इस अंधियारे में |

कोई चेहरा नज़र आता है रौशनी में

और चला जाता है जैसे समय गुज़रता है दिन-ब-दिन |

जब कोई उस उजाले में रहकर उससे दिल लगाता है,

तब वह उसे छोड़ भी जाता है |

इस तरह उसकी फितरत का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल हो जाता है |

समय-समय पर ऐसे चेहरे भी है

जो उसकी रोशनी दूसरों तक पहुंचाते हैं |

एक समय तो एक ने मुझ तक हाथ भी बढ़ाया,

मुझे उस उजाले में बुलाने के लिए

पर शायद मैं ही डरा हुआ था उसे मन से अपनाने में,

क्योंकि मैंने देखा है उस हश्र को जो लोगों का हुआ है |

परन्तु क्या डर ही सब कुछ है,

या कुछ पल की ख़ुशी भी मायने रखती है |

फिर यह एहसास होता है कि कहीं

यह दिल अँधेरे में तो नहीं लग गया है,

कि डर है उजाले मे पहचाना जाऊं

जो मैं छुपाने की कोशिश में रहता हूँ |

यह भी नहीं है, शायद वही मेरी पहचान भी है

कि मैं वही हूँ, उनका सहारा जो डूब रहें हैं उस गहराई में,

जो हारकर संघर्ष करना छोड़ गए हैं,

मैं वो हूँ जो उनकी उदासी को दूर भगाकर

अपने मन में जगह देता हूँ

और सबका भला भी हो ही जाता है |

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