हर वक़्त तलाश में…

क्यों बर्दाश्त नहीं करता मैं,

क्यों बेतुकी बातों के आगे दीवार बन बैठता हूँ,

मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ,

खुद को बेकदर बेवजह परेशां कर बैठता हूँ,

वही आदत कि कुछ तो कहना ही है,

अपने को अपने लिए अपने तक बहुत सीमित रखा है मैंने,

पर बात जब अपने से ज्यादा बाकी लोगों तक पहुंचे,

तो खुद को जाहिर करना चाहत नहीं ज़रूरत हो जाता है,

कुछ लोग अपनी इरादों की प्रधानता दूसरों पर थोपते हैं,

यही तो खेल है, सब बात ताकत और घमंड पर ही अटकती है,

दुश्मन से लड़ना तो आसान होता है,

मुश्किल होता है अपनों का सामना करना,

पर ज़रूरी है, अपने खातिर नहीं पर सबके खातिर

सच की यही एक कमी है शायद,

उसे उसके एक सही वक़्त पर बयाँ करना होता है,

उसका असर एक वक़्त बाद नहीं रहता,

जैसे बीमारी में ही दवाई लगती है,

मुर्दे को तो सब बेमाना है,

ऐसा ही हुआ है कई बार,

खुद के सच की वकालत में,

खुद ही चोटिल हुआ हूँ,

फिर आपा खोकर भूल जाता हूँ सब कुछ,

वक़्त, जगह, लोग, भाव

रह जाता है सिर्फ सच का साथ,

शायद वही एक वक़्त है उस वक़्त खुद को जिंदा महसूस करता हूँ

जिंदा रहने को हर वक़्त सच की तलाश करता हूँ…

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