जब मैं लिखता हूँ

जब मैं लिखता हूँ
तो लफ्ज़ आसमान से या किसी किताब से छांटकर नहीं लाता
दिल में कहीं कोई अनकही आवाज़ गूंजती है
लोगों को बोलना आया नहीं
उनको समझाने की कोशिश करने का मन किया नहीं
समझते सभी अपने नज़रिए के दायरे में ही हैं
मन की आवाज़ ने खुद को लफ़्ज़ों में तराशा
धीरे-धीरे एक आदत सी बन गयी
हो तो ये भी सकता था कि लफ़्ज़ों को फिर से आवाज़ बना देता
लेकिन फिर ये एहसास हुआ कि
गर इतने माध्यमों से गुज़रते हुए भाव कहीं अपनी पहचान न खो दे
जैसा वो लफ्ज़ थे, उनको वैसा कागज़ पर उतारा
जो भी लिखता हूँ खुद के सन्दर्भ में लिखता हूँ
किसी और का ज़िक्र भी हो लेकिन उसमे मैं हीहोता हूँ
लोगों ने कई बार पुछा है, कि आखिर “वो” कौन है
हर इन्सान को मैंने अलग जवाब दिए हैं
हकीक़त से अभी पर्दा उठाने का मन नहीं है
ज़िन्दगी बहुत बाकी है, खेल बहुत लम्बा है
इतना जानने के लिए एक साथ निभाना पड़ेगा
पढ़ते रहोगे, तो जान जाओगे
ऐसा कोई राज़ नहीं है, पर जो है वो यहीं हैं, इन्ही लफ़्ज़ों में
मैं भी जो हूँ, वो इन्ही लफ़्ज़ों में है
अब मैं इनके अनुसार ही जीने लगा हूँ
ज़िन्दगी आसान हो जाती है, कोई ढांचा गर मिल जाए
और बात रही “उनकी”, तो उनके चेहरे बहुत से हैं
ज़िन्दगी के अलग-अलग वक़्त में जो अज़ीज़ था
बदलता गया, इसका तालुक्क किसी शख्स या भाव या ज़िन्दगी से हो सकता है
पर ये सब बातें पढने वाले पर निर्भर करता है
किसी के लिए चारदीवारी घर है तो किसी के लिए पिंजरा
किसी के लिए मोहब्बत कोई शख्स है तो किसी के लिए ज़िन्दगी
हर कोई अलग है, मैं क्यों लिखता हूँ?
शायद अब आदत सी हो गयी है
या खुद को ज़ाहिर करने का कोई और तरीका मालूम नहीं
हर पल मन में उठे एहसास को गर लिखता रहूँ
तो ज़िन्दगी कम ही पड़ जाएगी
क्योंकि ज़िन्दगी ने हर पल में इतने एहसास भर दिए हैं
पल-पल को लिखने में दिन गुज़र जाते हैं
रातें तक लग जाती हैं,
दिन रात के खेल में फँसकर मैं लिखता रहता हूँ
और जब भी लिखता हूँ
तो सोचता हूँ, कि लिखने को तो सब लिख डालूँ
लेकिन जब रुकूँगा
तब तक एक एहसास फिर गूँज उठेगा…
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