Unknown whereabouts…

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I do not have anything, yet i hope for everything.

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बाँध लो कविता में…

मुझे बांध लो कविता में

और साथ ले जाओ

मुझे नहीं रहना यहाँ

उदास इस जहाँ में

तुम साथ होगे तो

सब सह लेंगे हँसकर

लिख दो आज मुझे

तोड़ तो मुझे एक नज़्म में

उतार दो कागज़ में

स्याही कर दो मुझे

कोई दाग न छोड़ना

लफ्ज़ भी रोते हैं

जानते हो तुम

जब तुम सो जाते हो

तो सुनता हूँ उनका गिला

कह रहा हूँ लिख दो मुझे

ले जाओ, कविता बनाकर

जब भी कहोगी

मुझको साँस मिलेगी

जब भी दोहराओगी मन में

ज़िंदा हो जाओगी

सुनेगा कोई तब हम साथ होंगे

एक ही पल में एक होंगे

मिलेंगे और जुदा होंगे

पर तुम्हारी जुबां पर होंगे

लिख दो हमें

बेताब है हम

चाहते हैं बनना लफ्ज़ तुम्हारे

मिलेगी एक पहचान

तुम्हारी जुबां से

बाँध लो हमें

कि हम बिखरने वाले हैं

पहले टूट चुके हैं बहुत

खुद ही जोड़ा था तब

आज इंतज़ार है

कोई पिरोह दे लफ़्ज़ों में

बांध लो कि देर न हो जाए

कि कहीं ये रात बीत न जाए

सुबह होगी तो मैं नहीं

लफ़्ज़ो की लाश मिलेगी

साथ नहीं चल सकेंगे तुम्हारे

फिर भी कन्धा देना

एक और नज़्म लिखना

हम नहीं, हमारी रूह

लिखोगे तो हम मिलेंगे

चाहोगी तो नज़र आएंगे

बाँध लो हमें नज़रों में

कि हम लफ्ज़ है, सुनाई देते हैं

ज़िंदा रखना है तुम्हे

तुम दोहराते रहना, हम सांस लेते रहेंगे

बांध लो कि देर न हो जाये।

इंतजार

इस बंद चारागाह में इंतजार करना ही अब मेरी किस्मत है,

मैं कैद नहीं हूँ, पर ख्यालों के पंख अब कट चुके हैं

न कोई रौशनी, न कोई आहट, बस दूर क़दमों की चहलपहल

आँखें बंद करता हूँ, तो खुद को आसमान में उड़ता हुआ महसूस करता हूँ

सिर्फ बादलों का सफ़ेद धुआं, इतना सफ़ेद की आँखें खोले रखना मुश्किल है

आँखें खुले तो फिर अँधेरे में, बंद हो तो रौशनी का सागर है

नज़रें तलाश कर रही हैं किसीको, शायद उसी को

पर वो तो हकीक़त में है, ये तो ख्वाबो-ख्याल है

पर मुझे लगा था कि मैं उड़ नहीं सकता, ख्वाब नहीं देख सकता

क्या मैं गलत हूँ, क्या मैं अपने मन कि साजिश में गिरफ्तार हूँ

दरवाज़े पर फिर कोई आहट हुई है, कोई है

वो दरवाज़ा खटखटा क्यों नहीं रहा, मुझे मालूम है वो वहां है

दरवाज़े के नीचे से पीपती हुई रौशनी कमरे में आ रही है

अभी इसी उलझन में हूँ कि दरवाज़ा खोलूं या नहीं

फिर आँखें बंद कर लेता हूँ, लेकिन अब बादल छट चुके हैं

सामने भीड़ है, कोई चेहरा नहीं, चेहरे धुंधले हैं

कोई कुछ बोल नहीं रहा, बस एक ही जगह खड़े हैं

हकीक़त और ख्वाब में कोई फर्क नहीं रहा

आखिर मन किसे ढून्ढ रहा है, कौन है जो वहां है पर नहीं है

धड़कने बढ़ गयी हैं, डर ने मुझको काबू कर लिया है

ख्वाब अब मिट चुका है, वहां भी अँधेरा है

मैं झट से भागा, पर वहां कोई नहीं है

दूर एक बल्ब जल रहा है, मैंने घूर कर देखा उसे

वो रौशनी बहुत अच्छी लगी, फिर कोई आ रहा है

मैं अन्दर आ गया हूँ, अब पहले से ज्यादा अँधेरा है

पहले चारदीवारी महसूस हो रही थी, अब सब काला है

अब दीवारें भी मुझसे दूर हो गयी हैं, कुछ नहीं है पास मेरे

ये चारागाह अब कैद लगने लगी है

इंतजार करता हूँ, सुबह होने का

पर कहीं आँखें न बंद हो जाए, फिर कोई आता भी तो नहीं यहाँ पे

जो सुबह होने पर हाथ लगाये, और नींद से जगाये

मैं इंतजार कर रहा हूँ, इस चारागाह कि कैद में

सुबह होने का, मेरे जागने का

मैं देखूंगा कौन है जो रातों में दरवाज़े पर आहट देकर मजाक करता है

अभी क्या वक़्त हुआ है, रात ही है न, ख्वाब तो नहीं

वक़्त भी नाराज़ है, हमसे कोई रिश्ता नहीं रखता

दूर रहता है, महसूस करना मुश्किल हो गया है

अब आदत हो गई है, ये रात भी हर रात है

अब ज़िन्दगी ही रात है, सुबह होता नहीं है

दिन एक ख्वाब है, याद नहीं कब इस कमरे से बाहर निकला था

निकला था तो क्या मैं निकला था या कोई और

मैं तो कब से कैद हूँ, इंतजार में रात में किसी के आने का

दरवाज़ा खुल जाए तो मैं मुक्त हो जाऊं

इस कैद से उस दुनिया की कैद में जहाँ हर कोई वक़्त का गुलाम है

आसमान देखना है, तारे गिनने है, चाँद ढूँढना है

किसी के साथ, अकेले तो ख्वाब भी देख लेता हूँ

इंतजार ख़तम नहीं हो रहा, रात बहुत लम्बी है

सवेरा गुमशुदा है, तलाश जारी है

मैं आँखें बंद कर लेता हूँ, सुबह होगी तो जगाना

मैं इंतजार कर रहा हूँ, इस कैद में 

अँधेरे में, उमीदों में, ख्वाबों में…

हर वक़्त तलाश में…

क्यों बर्दाश्त नहीं करता मैं,

क्यों बेतुकी बातों के आगे दीवार बन बैठता हूँ,

मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ,

खुद को बेकदर बेवजह परेशां कर बैठता हूँ,

वही आदत कि कुछ तो कहना ही है,

अपने को अपने लिए अपने तक बहुत सीमित रखा है मैंने,

पर बात जब अपने से ज्यादा बाकी लोगों तक पहुंचे,

तो खुद को जाहिर करना चाहत नहीं ज़रूरत हो जाता है,

कुछ लोग अपनी इरादों की प्रधानता दूसरों पर थोपते हैं,

यही तो खेल है, सब बात ताकत और घमंड पर ही अटकती है,

दुश्मन से लड़ना तो आसान होता है,

मुश्किल होता है अपनों का सामना करना,

पर ज़रूरी है, अपने खातिर नहीं पर सबके खातिर

सच की यही एक कमी है शायद,

उसे उसके एक सही वक़्त पर बयाँ करना होता है,

उसका असर एक वक़्त बाद नहीं रहता,

जैसे बीमारी में ही दवाई लगती है,

मुर्दे को तो सब बेमाना है,

ऐसा ही हुआ है कई बार,

खुद के सच की वकालत में,

खुद ही चोटिल हुआ हूँ,

फिर आपा खोकर भूल जाता हूँ सब कुछ,

वक़्त, जगह, लोग, भाव

रह जाता है सिर्फ सच का साथ,

शायद वही एक वक़्त है उस वक़्त खुद को जिंदा महसूस करता हूँ

जिंदा रहने को हर वक़्त सच की तलाश करता हूँ…

Mother

Saw you the other day; you lie helpless on a bed with a device pumping air into your body. Two men helping you walk, one girl feeding you porridge and other girl wiping your drool. Eyes and hands gestures for what you wanted. You blinked and called me nearer. Your trembling lips said my […]

via Maa! — Shiva!

कल से आज को देख रहा हूँ…

ऐसे हालात जब रोज़मर्रा की चीज़ें हादसा लगने लगी

तब कुछ पल ठहरा, देखा आज कहाँ हूँ

ये जानना बहुत ज़रूरी था कि ऐसा क्यों है

शायद एक लम्बे अरसे से ज़िन्दगी बस जी रहा हूँ

एक अरसे पहले ही एक हादसे ने ज़िन्दगी बदल दी थी

आज हर लम्हा एक हादसा है

यकीन करना मुश्किल हो गया है कि मैं ऐसा बन गया हूँ

हर इंसान की तरह मैं भी वक़्त का नतीजा हूँ

दरअसल मैं आज भी उस वक़्त में कैद हूँ जो गुज़र गया

मैं आगे नहीं बढ़ा, वक़्त आगे बढ़ रहा है

मैं बीते दिनों के चश्में से आज को देख रहा हूँ

न जाने कब तक, शायद मन ही मन किसी हादसे का इंतज़ार कर रहा हूँ…

वक़्त तो दरिया है, बह जाता है…

अगर तुम कह देते जो कहना चाहते

तो बात यहाँ तक न पहुँचती

एक दुसरे की मौजूदगी

हमें यूँ बेचैन न करती

ठुकरा दिया होता तुमने अपने अहम् को

हमने अपने डर को

तो आज मैं लिख न रहा होता

और तुम पढ़ न रहे होते…